Reads 51 times
PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
विवाह संस्कार का उपदेश।
Word-Meaning: - (चित्तिः) चेतना [कन्या की] (उपबर्हणम्) छोटी ओढ़नी [समान] (आः) होवे, (चक्षुः) दर्शनसामर्थ्य (अभ्यञ्जनम्) उबटन [शरीर मलने के द्रव्य के तुल्य] (आः) होवे। (द्यौः) आकाश और (भूमिः) भूमि (कोशः) निधिमञ्जूषा [पेटी पिटारी समान] (आसीत्) होवे, (यत्) जब (सूर्या) प्रेरणा करनेवाली [वा सूर्य की चमक के समान तेजवाली] कन्या (पतिम्) पतिको (अयात्) प्राप्त होवे ॥६॥
Connotation: - जब कन्या बाहिरीउपकरणों की उपेक्षा करके भीतरी विद्याबल से चेतन्य स्वभाव, और पदार्थों को दिव्यदृष्टि से देखनेवाली, और आकाश और भूमि से सुवर्ण आदि प्राप्त करने करानेवाली हो, तब सुयोग्य पति से ब्याह करे ॥६॥यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१०।८५।७ ॥
Footnote: ६−(चित्तिः)चेतना। बुद्धिः (आः) बहुलं छन्दसि। पा० ७।३।९७। अस्तेर्लङि, ईडभावः, तलोपेसकारस्य रुत्वविसर्गौ। आसीत्। छन्दसि। लुङ्लङ्लिटः। पा० ३।४।६। इति लिङर्थेलङ्। स्यात्। एवमन्यत्रापि ज्ञातव्यम्। (उपबर्हणम्) उपवस्त्रं यथा (चक्षुः)दर्शनसामर्थ्यम्। (आः) स्यात् (अभ्यञ्जनम्) शरीरमर्दनद्रव्यं यथा (द्यौः) आकाशः (भूमिः) (कोशः) निधिमञ्जूषा यथा (आसीत्) स्यात् (यत्) यदा (अयात्) याप्रापणे-लङ्। यायात्। प्राप्नुयात् (सूर्या) अ० ९।४।१४। राजसूयसूर्य०। पा०३।१।११४। सृ गतौ यद्वा षू प्रेरणे निपातनात् क्यपि रूपसिद्धिः। सूर्याद् देवतायांचाब् वक्तव्यः। वा० पा० ४।१।४८। इति चाप्। सूर्या वाङ्नाम-निघ० १।११। पदनाम-निघ०५।६। सूर्या सूर्यस्य पत्नी-निरु० १२।७। पत्नी=विभूतिर्दीप्तिः। प्रेरिका।सूर्यदीप्तिवत्तेजस्विनी कन्या (पतिम्) भर्तारम् ॥
