Go To Mantra
Viewed 68 times

त्वष्टा॒ वासो॒व्यदधाच्छु॒भे कं बृह॒स्पतेः॑ प्र॒शिषा॑ कवी॒नाम्। तेने॒मां नारीं॑ सवि॒ताभग॑श्च सू॒र्यामि॑व॒ परि॑ धत्तां प्र॒जया॑ ॥

Mantra Audio
Pad Path

त्वष्टा । वास: । वि । अदधात् । शुभे । कम् । बृहस्पते: । प्रऽशिषा । कवीनाम् । तेन । इमाम् । नारीम् । सविता । भग: । च । सूर्याम्ऽइव । परि । धत्ताम् । प्रऽजया ॥१.५३॥

Atharvaveda » Kand:14» Sukta:1» Paryayah:0» Mantra:53


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

विवाह संस्कार का उपदेश।

Word-Meaning: - (त्वष्टा)सूक्ष्मदर्शी [आचार्य] (बृहस्पतेः) बड़ी वेदवाणियों की रक्षिका [बृहस्पतिपदवीवाली स्त्री] के (शुभे) शुभ [आनन्द] के लिये (कवीनाम्) बुद्धिमानों की (प्रशिषा) अनुमति से (कम्) आनन्द के साथ (वासः) वस्त्र [वेष] (वि) विशेष करके (अदधात्) दिया है। (तेन) इस कारण से (सूर्याम् इव) सूर्य की चमक के समान [शोभायमान] (इमाम् नारीम्) इस नारी [नर की पत्नी] को (सविता) प्रेरक विद्वानोंका समूह (च) और (भगः) ऐश्वर्यवान् पति, दोनों (प्रजया) प्रजा [सन्तान सेवक आदि]के साथ (परि) सब ओर से (धत्ताम्) धारण करें ॥५३॥
Connotation: - जिस विदुषी स्त्री नेविद्या प्राप्त करके विद्वानों के समाज में बृहस्पति, स्नातक आदि पदवी लेकरविद्यासूचक वस्त्र अर्थात् वेष प्राप्त किया हो, विद्वान् लोग और पति उसकी सदाप्रतिष्ठा करें, जिससे वह उत्तम प्रजावाली होवे ॥५३॥
Footnote: ५३−(त्वष्टा)सूक्ष्मदर्श्याचार्यः (वासः) वस्त्रम्। वेषम् (वि) विशेषेण (अदधात्) दत्तवान् (शुभे) शुभाय। सुखाय (कम्) (बृहस्पतेः) बृहतीनां वेदवाणीनां रक्षिकायाः।बृहस्पतिपदवीयुक्तायाः स्त्रियाः (प्रशिषा) अनुमत्या (कवीनाम्) मेधाविनाम् (तेन)कारणेन (इमाम्) प्रसिद्धाम् (नारीम्) नरपत्नीम् (सविता) प्रेरको विद्वत्समूहः (भगः) ऐश्वर्यवान् पतिः (च) (सूर्याम् इव) सूर्यदीप्तिमिव शोभायमानाम् (परि)सर्वतः (धत्ताम्) धारयताम् (प्रजया) सन्तानसेवकादिना सह ॥