मन्त्र १-५, प्रकाश करने योग्य और प्रकाशक के विषय काउपदेश।
Word-Meaning: - (सोमः) हे सर्वोत्पादकपरमेश्वर (आच्छद्विधानैः) ढक लेनेवाले विधानों से (गुपितः) गुप्त [अन्तर्धान] कियागया और (बार्हतैः) वेदवाणियों द्वारा कहे गये नियमों से (रक्षितः) रक्षा कियागया, (ग्राव्णाम्) विद्वानों की [प्रार्थना] (इत्) अवश्य (शृण्वन्) सुनता हुआ तू (तिष्ठसि) ठहरता है, (पार्थिवः) पृथिवी [के विषयों] में आसक्त पुरुष (ते) तेरे [अनुभव को] (न) नहीं (अश्नाति) भोगता है ॥५॥
Connotation: - सर्वव्यापक परमात्माअपने अनन्त सर्वश्रेष्ठ नियमों से सुरक्षित रह कर बड़े उपकार करता है, उस कोविद्वान् ही जानते हैं, सामान्य मनुष्य नहीं जान सकते। इसलिये सब मनुष्यविद्वान् होकर ईश्वरज्ञान से उन्नति करें ॥५॥यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१०।८५।४॥