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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
विवाह संस्कार का उपदेश।
Word-Meaning: - (शतक्रतो) हे सैकड़ोंप्रकार की बुद्धियों वा कर्मोंवाले ! (इन्द्र) हे बड़े ऐश्वर्यवाले [पति !] (रथस्य) रथ [रथरूप शरीर] के (खे) गमन [चेष्टा] में, (अनसः) जीवन के (खे) गमन [उपाय] मेंऔर (युगस्य) योग [ध्यान] के (खे) गमन [चलने] में (अपालाम्=अपाराम्)अपार गुणवाली [ब्रह्मवादिनी पत्नी] को (त्रिः) तीन बार [कर्म, उपासना और ज्ञानसे] (पूत्वा) शोधकर (सूर्यत्वचम्) सूर्य के समान तेजवाली (अकृणोः) तू कर ॥४१॥
Connotation: - बुद्धिमान् विद्वान्पति प्रयत्न करे कि विदुषी पत्नी वेदज्ञान से शुद्ध होकर शरीर को उचित चेष्टामें, जीवन को सुन्दर उपाय में, और मन को ईश्वरभक्ति में लगाकर संसार में कीर्तिपावे ॥४१॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-सायणभाष्य ८१।८०।७ और अजमेरवैदिकयन्त्रालय पुस्तक ८।९१।७ ॥
Footnote: ४१−(खे) खर्व गतौ-ड। गमने। चेष्टने। उपाये (रथस्य) रथरूपस्य शरीरस्य (खे) उपाये (अनसः) अन जीवने-असुन्। जीवनस्य (खे) गतौ (युगस्य) योगस्य। ध्यानस्य (शतक्रतो) हे बहुप्रज्ञ। बहुकर्मन् (अपालाम्) रस्यलः। अपाराम्। अपारगुणवतीं ब्रह्मवादिनीं पत्नीम् (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् पते (त्रिः) त्रिवारं कर्मोपासनाज्ञानैः (पूत्वा) शोधयित्वा (अकृणोः) त्वं कुर्याः (सूर्यत्वचम्) त्वच संवरणे-असुन्। सूर्यवत्तेजस्विनीम् ॥
