Word-Meaning: - (यः) जो [परमेश्वर] (अनिध्मः) बिना चमकता हुआ [अन्तर्यामी] रहकर (अप्सु अन्तः) प्रजाओं के भीतर (दीदयत्) चमकता है, (यम्) जिस [परमेश्वर] की, (विप्रासः) बुद्धिमान् लोग (अध्वरेषु) सन्मार्ग बतानेवाले व्यवहारों में, (ईडते) बड़ाई करते हैं, [सो तू] (अपाम्) प्रजाओं के मध्य (नपात्) नाशरहित [परमेश्वर !] (मधुमतीः) मधु विद्या सेयुक्त [पूर्ण विज्ञानवती] (अपः) प्रजाएँ (दाः) दे, (याभिः) जिन [प्रजाओं] से (इन्द्रः) बड़ा ऐश्वर्यवान् मनुष्य (वीर्यवान्) वीर्यवान् [धीर, वीर, शरीर, इन्द्रिय, और मन की अतिशय शक्तिवाला] होकर (वावृधे) बढ़ता है ॥३७॥
Connotation: - वधू-वर को उचित है किविद्वानों के समान सर्वान्तर्यामी सर्वनियन्ता परमात्मा की उपासना करकेब्रह्मचर्यादि से विद्वान् सन्तान, सेवक आदि प्राप्त करें और वेदविद्या द्वाराबढ़ाकर सदा उन्नति करते रहें ॥३७॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।३०।४, और निरुक्त १०।१९ में भी व्याख्यात है ॥