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तृ॒ष्टमे॒तत्कटु॑कमपा॒ष्ठव॑द्वि॒षव॒न्नैतदत्त॑वे। सू॒र्यां यो ब्र॒ह्मा वेद॒ सइद्वाधू॑यमर्हति ॥

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Pad Path

तृष्टम् । एतत् । कटुकम् । अपाष्ठऽवत् । विषऽवत् । न । एतत् । अत्तवे । सूर्याम्‌ । य: । ब्रह्मा । वेद । स: । इत् । वाधूऽयम् । अर्हति ॥१.२९॥

Atharvaveda » Kand:14» Sukta:1» Paryayah:0» Mantra:29


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

विवाह संस्कार का उपदेश।

Word-Meaning: - (एतत्) यह [पूर्वोक्तशुभ लक्षण वधू-वर के विरोध में] (तृष्टम्) दाहजनक, (कटुकम्) कडुवा [अप्रिय], (अपाष्ठवत्) अपस्थान [अपमान] युक्त और (विषवत्) विषसमान [होता है], (एतत्) यह [विरुद्धपन] (अत्तवे) प्रबन्ध करने के लिये (न) नहीं [होता]। (यः) जो (ब्रह्मा)ब्रह्मा [वेदवेत्ता पति] (सूर्याम्) प्रेरणा करनेवाली [वा सूर्य की चमक के समानतेजवाली] कन्या को (वेद) जानता है, (सः इत्) वही (वाधूयम्) विवाह कर्म के (अर्हति) योग्य होता है ॥२९॥
Connotation: - जहाँ पर वधू-वर परस्परविरोधी निर्गुणी होते हैं, वहाँ गृहाश्रम में विपत्ति रहती है, और जब दोनोंपूर्ण विद्वान् और युवा होकर परस्पर गुण जानकर विवाह करते हैं, तब वे गृहाश्रममें आनन्द भोगते हैं ॥२९॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।८५।३४॥
Footnote: २९−(तृष्टम्) दाहजनकम् (एतत्) पूर्वोक्तम् (कटुकम्) अप्रियम् (अपाष्ठवत्)अपस्थानेनापमानेन युक्तम् (विषवत्) विषसमानम् (न) निषेधे (एतत्) विरुद्धं कर्म (अत्तवे) तुमर्थे सेसेनसे०। पा० ३।४।९। अत बन्धने-तवेन्। प्रबन्धं कर्तुम् (सूर्याम्) (यः) (ब्रह्मा) वेदज्ञः पतिः (वेद) जानाति (सः) (इत्) एव (वाधूयम्)वैवाहिकं विधानम् (अर्हति) कर्तुं योग्यो भवति। पूजयति ॥