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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।
Word-Meaning: - [हे परमात्मन् !] तू (अम्भः) व्यापक, (अमः) ज्ञानस्वरूप, (महः) पूज्य और (सहः) सहनस्वभाव [ब्रह्म] है, (इति) इस प्रकार से (वयम्) हम (त्वा उप आस्महे) तेरी उपासना करते हैं ॥५०॥
Connotation: - मनुष्य शुद्ध अन्तःकरण से परमात्मा की उपासना करके उन्नति करें ॥५०॥इस मन्त्र से लेकर मन्त्र ५३ तक बम्बई गवर्नमेन्ट बुक डिपो और अजमेर वैदिक यन्त्रालय के पुस्तकों में मन्त्र के पीछे आवृत्ति का चिह्न देकर मन्त्र ४८ और ४९ की आवृत्ति मानी है, परन्तु अन्य पुस्तकों में आवृत्ति का चिह्न नहीं हैं ॥
Footnote: ५०−(अम्भः) म० १४। आप्लृ व्याप्तौ-असुन्। व्यापकं ब्रह्म (अमः) अम गतौ-असुन्। ज्ञानस्वरूपम् (महः) पूजनीयम् (सहः) सहनशीलम्। अन्यत् पूर्ववत्-म० ४७ ॥
