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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।
Word-Meaning: - (इन्द्र) हे परम ऐश्वर्यवाले [परमात्मन् !] (त्वम्) तू (अरात्याः) शत्रु से (भूयान्) अधिक बलवान्, (शच्याः) वाणी, कर्म वा बुद्धि का (पतिः) पति, (विभूः) व्यापक और (प्रभूः) समर्थ (असि) है, (इति) इस प्रकार से (वयम्) हम (त्वा उप आस्महे) तेरी उपासना करते हैं ॥४७॥
Connotation: - मनुष्यों को योग्य है कि पूर्ण बली सर्वस्वामी जगदीश्वर की उपासना से आत्मबल बढ़ावें ॥४७॥मन्त्र ४७-५१ महर्षिदयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका उपासनाविषय पृ० १६०-१६१ में व्याख्यात हैं ॥
Footnote: ४७−(भूयान्) अधिकतरो बली (अरात्याः) शत्रुसकाशात्, (शच्याः) शची वाङ्नाम-निघ० १।११। कर्मनाम−२।१। प्रजानाम−३।९। वाण्याः कर्मणो बुद्धेर्वा (पतिः) पालकः (त्वम्) (इन्द्रः) परमेश्वर्यवन् (असि) (विभूः) व्यापकः (प्रभूः) समर्थः (इति) अनेन प्रकारेण (त्वा) त्वाम् (उपास्महे) सेवामहे (वयम्) उपासकाः ॥
