Go To Mantra

यद्वा॑ कृ॒णोष्योष॑धी॒र्यद्वा॑ वर्षसि भ॒द्रया॒ यद्वा॑ ज॒न्यमवी॑वृधः ॥

Mantra Audio
Pad Path

यत् । वा । कृणोषि । ओषधी: । यत् । वा । वर्षसि । भद्रया । यत् । वा । जन्यम् । अवीवृध: ॥७.१५॥

Atharvaveda » Kand:13» Sukta:4» Paryayah:0» Mantra:43


Reads 42 times

PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

Word-Meaning: - (यत्) क्योंकि [हे परमेश्वर !] तू (वा) अवश्य (ओषधीः) ओषधियों [सोमलता अन्नादिकों] को (कृणोषि) बनाता है, (यत्) क्योंकि तू (वा) अवश्य (भद्रया) उत्तमता से (वर्षसि) मेह बरसाता है, और (यत्) क्योंकि तू ने (वा) अवश्य (जन्यम्) उत्पन्न होते हुए [जगत्] को (अवीवृधः) बढ़ाया है ॥४३॥
Connotation: - परमेश्वर वृष्टि द्वारा सोमलता अन्न आदि पदार्थ उत्पन्न करके सब प्राणियों का पालन करता हुआ अगणित उपकार करता है, और वह सर्वव्यापक होकर सब संसार को नियम में रखता है ॥४३-४५॥
Footnote: ४३−(यत्) यतः (वा) अवश्यम् (कृणोषि) जनयसि (ओषधीः) सोमलतान्नादिपदार्थान् (यत्) (वा) (वर्षसि) वृष्टिं करोषि (भद्रया) उत्तमतया (यत्) (वा) (जन्यम्) जनेर्यक्। उ० ४।१११। जन जनने-यक्। उत्पद्यमानं जगत् (अवीवृधः) वर्धितवानसि ॥