Go To Mantra

अ॒भ्यन्यदे॑ति॒ पर्य॒न्यद॑स्यतेऽहोरा॒त्राभ्यां॑ महि॒षः कल्प॑मानः। सूर्यं॑ व॒यं रज॑सि क्षि॒यन्तं॑ गातु॒विदं॑ हवामहे॒ नाध॑मानाः ॥

Mantra Audio
Pad Path

अभि । अन्यत् । एति । परि । अन्यत् । अस्यते । अहोरात्राभ्याम् । महिष: । कल्पमान: । सूर्यम्‌ । वयम् । रजसि । क्षियन्तम् । गातुऽविदम् । हवामहे । नाधमाना: ॥२.४३॥

Atharvaveda » Kand:13» Sukta:2» Paryayah:0» Mantra:43


Reads 39 times

PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

Word-Meaning: - (अन्यत्) एक कोई [उजाला] (अभि) सन्मुख (एति) चलता है, (अन्यत्) दूसरा [अन्धेरा] (परि) सब ओर (अस्यते) फेंका जाता है, [इस प्रकार] (महिषः) महान् [सूर्य लोक] (अहोरात्राभ्याम्) दिन और रात्रि [बनाने] के लिये (कल्पमानः) समर्थ होता हुआ [वर्तमान है]। (रजसि) सब लोक में (क्षियन्तम्) रहते हुए, (गातुविदम्) मार्ग जाननेवाले (सूर्यम्) सर्वप्रेरक [परमेश्वर] को (नाधमानाः) प्रार्थना करते हुए (वयम्) हम लोग (हवामहे) बुलाते हैं ॥४३॥
Connotation: - सूर्य के सर्वथा प्रकाशमान गोले के साथ घूमते हुए पृथिवी आदि लोक एक ही समय दो काम करते हैं−प्रकाश को आगे बढ़ाना और अन्धकार को पीछे की ओर बढ़ाना और आगे को हटाना, अर्थात् सूर्य न कभी अस्त और न कभी उदय होता है, पृथिवी के आधे गोले पर प्रत्येक समय प्रकाश और दूसरे आधे पर अन्धकार रहता है, ध्रुव के समीप भी सूर्य और पृथिवी के घूमाव से दिन और राति अधिक बड़े होते हैं। मनुष्य ऐसी अद्भुत रचना करनेवाले परमेश्वर की उपासना सदा करें ॥४३॥
Footnote: ४३−(अभि) अभिमुखम् (अन्यत्) एकम्। प्रकाशद्रव्यम् (एति) गच्छति (परि) सर्वतः (अन्यत्) द्वितीयम्। अन्धकारद्रव्यम् (अस्यते) क्षिप्यते (अहोरात्राभ्याम्) अहोरात्रौ कर्तुम् (महिषः) महान्। सूर्यलोकः (कल्पमानः) समर्थः सन् वर्तते (सूर्यम्) सर्वप्रेरकं परमात्मानम् (वयम्) (रजसि) सर्वस्मिन् लोके (क्षियन्तम्) निवसन्तम् (गातुविदम्) मार्गज्ञातारम् (हवामहे) आह्वयामः। (नाधमानाः) प्रार्थयमानाः ॥