Go To Mantra
Viewed 96 times

प्र॒त्यङ्दे॒वानां॒ विशः॑ प्र॒त्यङ्ङुदे॑षि॒ मानु॑षीः। प्र॒त्यङ्विश्वं॒ स्वर्दृ॒शे ॥

Mantra Audio
Pad Path

प्रत्यङ् । देवानाम् । विश: । प्रत्यङ् । उत् । एषि । मानुषी: । प्रत्यङ् । विश्वम् । स्व: । दृशे ॥२.२०॥

Atharvaveda » Kand:13» Sukta:2» Paryayah:0» Mantra:20


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

Word-Meaning: - [हे सूर्य !] (देवानाम्) गतिशील [चन्द्र आदि लोकों] की (विशः) प्रजाओं को (प्रत्यङ्) सन्मुख होकर, (मानुषीः) मानुषी मनुष्य संबन्धी [पार्थिव प्रजाओं] को (प्रत्यङ्) सन्मुख होकर और (विश्वम्) सब जगत् को (प्रत्यङ्) सन्मुख होकर (स्वः) सुख से (दृशे) देखने के लिये (उत्) ऊँचा होकर (एषि) तू प्राप्त होता है ॥२०॥
Connotation: - सूर्य गोल आकार बहुत बड़ा पिण्ड है, इसलिये वह सब लोकों को सन्मुख दीखता है, और सब लोक उसके आकर्षण प्रकाशन आदि से सुख पाते हैं, ऐसे ही परमात्मा के सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान् होने से उसके नियम पर चलकर सब सुखी रहते हैं ॥२०॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१।५०।५, और सामवेद−पू० ६।१४।१० ॥
Footnote: २०−(प्रत्यङ्) अभिमुखः सन् (देवानाम्) गतिशीलानां चन्द्रादिलोकानाम् (विशः) प्रजाः (प्रत्यङ्) (उत्) ऊर्ध्वः सन् (एषि) प्राप्नोषि (मानुषीः) मनुष्यसम्बन्धिनीः पार्थिवप्रजाः (प्रत्यङ्) (विश्वम्) सर्वम् (स्वः) सुखेन (दृशे) द्रष्टुम् ॥