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दि॒वि त्वात्त्रि॑रधारय॒त्सूर्या॒ मासा॑य॒ कर्त॑वे। स ए॑षि॒ सुधृ॑त॒स्तप॒न्विश्वा॑ भू॒ताव॒चाक॑शत् ॥

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Pad Path

दिवि । त्वा । अत्त्रि: । अधारयत् । सूर्य । मासाय । कर्तवे । स: । एषि । सुऽधृत: । तपन् । विश्वा । भूता । अवऽचाकशत् ॥2.१२॥

Atharvaveda » Kand:13» Sukta:2» Paryayah:0» Mantra:12


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

Word-Meaning: - (सूर्य) हे सूर्य ! [लोकों के चलानेवाले रविमण्डल] (अत्त्रिः) सदा ज्ञानवान् [परमात्मा] ने (मासाय) महीना [कालविभाग] (कर्तवे) करने के लिये (त्वा) तुझको (दिवि) आकाश में (अधारयत्) धारण किया है। (सः) वह तू (सुधृतः) अच्छी प्रकार धारण किया गया, (तपन्) तपता हुआ, और (विश्वा भूता) सब प्राणियों को (अवचाकशत्) निहारता हुआ (एषि) चलता है ॥१२॥
Connotation: - परमात्मा ने सूर्य को बहुत से लोकों पर आकर्षण, ताप, वृष्टि आदि पहुँचाने के लिये बनाया है, मनुष्य उसी प्रकार तेजस्वी होकर परस्पर पुरुषार्थ करें ॥१२॥
Footnote: १२−(दिवि) आकाशे (त्वा) सूर्यम् (अत्त्रिः) म० ४। सदा ज्ञानवान् परमात्मा (अधारयत्) स्थापितवान् (सूर्य) सांहितिको दीर्घः। हे रविमण्डल (मासाय) कालविभागायेत्यर्थः (कर्तवे) कर्तुम् (सः) स त्वम् (एषि) गच्छसि (सुधृतः) सुपुष्टः (तपन्) तापं कुर्वन् (विश्वा) सर्वाणि (भूता) लोकान् (अवचाकशत्) अ० ६।८०।१। भृशं पश्यन् ॥