Go To Mantra
Viewed 83 times

उ॒द्यन्र॒श्मीना त॑नुषे॒ विश्वा॑ रु॒पाणि॑ पुष्यसि। उ॒भा स॑मु॒द्रौ क्रतु॑ना॒ वि भा॑सि॒ सर्वां॑ल्लो॒कान्प॑रि॒भूर्भ्राज॑मानः ॥

Mantra Audio
Pad Path

उतऽयन् । रश्मीन्। आ । तनुषे । विश्वा । रूपाणि । पुष्यसि । उभा । समुद्रौ । क्रतुना । वि । भासि । सर्वान् । लोकान् । परिऽभू: । भ्राजमान: ॥2.१०॥

Atharvaveda » Kand:13» Sukta:2» Paryayah:0» Mantra:10


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

Word-Meaning: - [हे सूर्य !] (उद्यन्) ऊँचा होता हुआ तू (रश्मीन्) किरणों को (आ) सब ओर से (तनुषे) फैलाता है, और (विश्वा) सब (रूपाणि) रूपों [वस्तुओं] को (पुष्यसि) पुष्ट करता है। (उभौ) दोनों (समुद्रौ) समुद्रों [जड़ चेतन रूप संसार] को, (सर्वान् लोकान्) सब लोकों के (परिभूः) चारों ओर घूमता हुआ और (भ्राजमानः) चमकता हुआ तू (केतुना) अपने कर्म से (वि भासि) प्रकाशित कर देता है ॥१०॥
Connotation: - जिस प्रकार सूर्य ऊँचा होकर सृष्टि को प्रकाशित करके पुष्ट करता है, वैसे ही सब मनुष्य विद्या से सुभूषित होकर परोपकार करें ॥१०॥
Footnote: १०−(उद्यन्) उद्गच्छन् (रश्मीन्) किरणान् (आ) समन्तात् (तनुषे) विस्तारयसि (विश्वा) सर्वाणि (रूपाणि) वस्तूनि (पुष्यसि) वर्धयसि (उभा) द्वौ (समुद्रौ) जड़चेतनरूपौ संसारौ (केतुना) कर्मणा (वि) विविधम् (भासि) दीपयसि (सर्वान्) (लोकान्) (परिभूः) परिग्राहकः। परिभ्राम्यन् (भ्राजमानः) प्रकाशमानः ॥