Go To Mantra

रोहि॑तो॒ द्यावा॑पृथि॒वी अ॑दृंह॒त्तेन॒ स्व स्तभि॒तं तेन॒ नाकः॑। तेना॒न्तरि॑क्षं॒ विमि॑ता॒ रजां॑सि॒ तेन॑ दे॒वा अ॒मृत॒मन्व॑विन्दन् ॥

Mantra Audio
Pad Path

रोहित: । द्यावापृथिवी इत‍ि । अदृंहत् । तेन । स्व: । स्तभितम् । तेन । नाक: । तेन । अन्तरिक्षम् । विऽमिता । रजांसि । तेन । देवा: । अमृतम् । अनु । अविन्दन् ॥१.७॥

Atharvaveda » Kand:13» Sukta:1» Paryayah:0» Mantra:7


Reads 46 times

PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।

Word-Meaning: - (रोहितः) सबके उत्पन्न करनेवाले [परमेश्वर] ने (द्यावापृथिवी) सूर्य्य और भूमि को (अदृंहत्) दृढ़ किया, (तेन) उसी करके (स्वः) सामान्य सुख [अभ्युदय] (स्तभितम्) थाँभा गया है, (तेन) उसी करके (नाकः) विशेष सुख [निःश्रेयस मोक्षसुख, थाँभा गया है]। (तेन) उसी करके (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष और (रजांसि) सब लोक (विमिता) नाप डाले गये हैं, (तेन) उससे ही (देवाः) विद्वानों ने (अमृतम्) अमरपन [उत्साहवर्धक मोक्षसुख] (अनु) निरन्तर (अविन्दन्) पाया है ॥७॥
Connotation: - जिस परमेश्वर ने सब सृष्टि रची है और जो सबका नियन्ता है, उसी जगदीश्वर के ज्ञान से मनुष्य उन्नति करके आनन्द पाते हैं ॥७॥
Footnote: ७−(रोहितः) म० १। (द्यावापृथिवी) (अदृंहत्) दृढीकृतवान् (तेन) रोहितेन (स्वः) सामान्यसुखम्। अभ्युदयः (स्तभितम्) दृढीकृतम् (तेन) (नाकः) विशेषसुखम्। निःश्रेयसम्। मोक्षसुखम् (तेन) (अन्तरिक्षम्) (विमिता) विविधं परिमितानि (रजांसि) लोकाः (तेन) रोहितेन (देवाः) विद्वांसः (अमृतम्) अमरणम्। पुरुषार्थम् (अनु) निरन्तरम् (अविन्दन्) अलभन्त ॥