Go To Mantra
Viewed 68 times

एक॑पदी द्वि॒पदी॒ सा चतु॑ष्पद्य॒ष्टाप॑दी॒ नव॑पदी बभू॒वुषी॑। स॒हस्रा॑क्षरा॒ भुव॑नस्य प॒ङ्क्तिस्तस्याः॑ समु॒द्रा अधि॒ वि क्ष॑रन्ति ॥

Mantra Audio
Pad Path

एकऽपदी । द्विऽपदी । सा । चतु:ऽपदी । अष्टाऽपदी । नवऽपदी । बभूवुषी । सहस्रऽअक्षरा । भुवनस्य । पङ्क्ति । तस्या: । समुद्रा: । अधि । वि । क्षरन्ति ॥१.४२॥

Atharvaveda » Kand:13» Sukta:1» Paryayah:0» Mantra:42


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।

Word-Meaning: - (सा) वह [वेदवाणी] (एकपदी) एक [ब्रह्म] के साथ व्याप्तिवाली, (द्विपदी) दो [भूत भविष्यत्] में गतिवाली, (चतुष्पदी) चार [धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष] में अधिकारवाली, (अष्टापदी) आठ पद [छोटाई, हलकाई, प्राप्ति, स्वतन्त्रता, बड़ाई, ईश्वरपन, जितेन्द्रियता और सत्यसङ्कल्प, आठ ऐश्वर्य] प्राप्त करानेवाली, (नवपदी) नौ [मन बुद्धि सहित दो कान, दो नथने, दो आँखें और एक मुख] से प्राप्ति योग्य, (सहस्राक्षरा) सहस्रों [असंख्यात] पदार्थों में व्याप्तिवाली (बभूवुषी) होकर के (भुवनस्य) संसार की (पङ्क्तिः) फैलाव शक्ति है, (तस्याः) उस [वेदवाणी] से (समुद्राः) समुद्र [समुद्ररूप सब लोक] (अधि) अधिक-अधिक (वि) विविध प्रकार से (क्षरन्ति) बहते हैं ॥४२॥
Connotation: - यह मन्त्र गत मन्त्र का उत्तर है। वेदवाणी परमेश्वर से उत्पन्न होकर संसार में सब उत्तम ज्ञानों का भण्डार है, उसी को विचार कर विद्वान् लोग आनन्द भोगते हैं ॥४२॥ यह मन्त्र पहिले आ चुका है-अ० ९।१०।२१। और कुछ भेद से ऋग्वेद में भी है-म० १।१६४।४१, ४२ ॥
Footnote: ४२−अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० ९।१०।२१। (एकपदी) एकेन ब्रह्मणा पदं व्याप्तिर्यस्याः सा (द्विपदी) भूतभविष्यतोर्गतिर्यस्याः सा (सा) गौः। वेदवाणी (चतुष्पदी) चतुर्वर्गे धर्मार्थकाममोक्षेषु पदमधिकारो यस्याः सा (अष्टापदी) अणिमा लघिमा प्राप्तिः प्राकाम्यं महिमा तथा। ईशित्वं च वशित्वं च तथा कामावसायिता ॥१॥ इत्यष्टैश्वर्याणि पदानि प्राप्तव्यानि यथा सा (नवपदी) मनोबुद्धिसहितैः सप्तशीर्षण्यच्छिद्रैः प्राप्या, (बभूवुषी) भवतेः क्वसु, ङीप्। भूतवती (सहस्राक्षरा) अशू व्याप्तौ-सर। असंख्यातेषु पदार्थेषु व्यापनशीला (भुवनस्य) संसारस्य (पङ्क्तिः) पचि व्यक्तीकरणे-क्तिन्। विस्तृतिः (तस्याः) वेदवाण्याः सकाशात् (समुद्राः) समुद्ररूपा लोकाः (अधि) अधिकम् (वि) विविधम् (क्षरन्ति) संचलन्ति ॥