Go To Mantra

अ॒वः परे॑ण प॒र ए॒नाव॑रेण प॒दा व॒त्सं बिभ्र॑ती॒ गौरुद॑स्थात्। सा क॒द्रीची॒ कं स्वि॒दर्धं॒ परा॑गा॒त्क्व स्वित्सूते न॒हि यू॒थे अ॒स्मिन् ॥

Mantra Audio
Pad Path

अव: । परेण । पर: । एना। अवरेण । पदा । वत्सम् । बिभ्रती । गौ: । उत् । अस्थात् । सा । कद्रीची । कम् । स्वित् । अर्धम् । परा । अगात् । क्व। स्वित् । सूते । नहि । यूथे । अस्मिन् ॥१.४१॥

Atharvaveda » Kand:13» Sukta:1» Paryayah:0» Mantra:41


Reads 43 times

PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।

Word-Meaning: - (परेण) दूर स्थान से (अवः) इधर और (एना) इस (अवरेण) अवर [समीप स्थान] से (परः) परे [दूर वर्तमान] (वत्सम्) सबके निवास देनेवाले वा उपदेश करनेवाले [परमेश्वर] को (पदा) पद [अधिकार] के साथ (बिभ्रती) धारण करती हुई (गौः) वेदवाणी (उत् अस्थात्) ऊँची उठी है। (सा) वह [वेदवाणी] (कद्रीची) किस ओर चलती हुई, (कं स्वित्) कौन से (अर्धम्) ऋद्धिवाले परमेश्वर को (परा) पराक्रम से (अगात्) पहुँची है, (क्व स्वित्) कहाँ पर (सूते) उत्पन्न होती है, (अस्मिन्) इस [देहधारी] (यूथे) समूह में (नहि) नहीं [उत्पन्न होती है] ॥४१॥
Connotation: - विद्वान् लोग परमेश्वर के सर्वव्यापकता आदि गुणों को विचारते हुए अपौरुषेय वेदवाणी को उसके ज्ञान का आधार समझ कर उसके विषय में जो प्रश्न करें, उसका उत्तर आगे के मन्त्र में है ॥४१॥यह मन्त्र ऊपर आ चुका है-अ० ९।९।१७। और ऋग्वेद में भी कुछ भेद से है-म० १।१६४।१७ ॥
Footnote: ४१-अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० ९।९।१७। (अवः) अवस्तात्। समीपदेशे (परेण) दूरदेशेन (परः) परस्तात्। दूरदेशे (एना) एनेन। अनेन (अवरेण) समीपस्थेन (पदा) पदेन। अधिकारेण (वत्सम्) वस निवासे, वद व्यक्तायां वाचि-स प्रत्ययः। सर्वनिवासकम्। सर्वोपदेशकम् (बिभ्रती) धरन्ती (गौः) वेदवाणी (उत्) उत्कर्षेण (अस्थात्) स्थितवती (सा) वेदवाणी (कद्रीची) क्व गच्छन्ती (कं स्वित्) (अर्धम्) ऋधु वृद्धौ-घञ्। वृद्धिशीलं परमेश्वरम् (परा) पराक्रमेण (अगात्) अगमत् (क्व) कुत्र (स्वित्) (सूते) सूयते। उत्पद्यते (नहि) निषेधे (यूथे) समूहे (अस्मिन्) ॥