Go To Mantra

उद्वाज॒ आ ग॒न्यो अ॒प्स्वन्तर्विश॒ आ रो॑ह॒ त्वद्यो॑नयो॒ याः। सोमं॒ दधा॑नो॒ऽप ओष॑धी॒र्गाश्चतु॑ष्पदो द्वि॒पद॒ आ वे॑शये॒ह ॥

Mantra Audio
Pad Path

उत् । वाज: । आ । गन् । य: । अप्ऽसु । अन्त: । विश: । आ । रोह । त्वत्ऽयोनय: । या: । सोमम् । दधान: । अप: । ओषधी: । गा: । चतु:ऽपद: । द्विऽपद: । आ । वेशय । इह॥१.२॥

Atharvaveda » Kand:13» Sukta:1» Paryayah:0» Mantra:2


Reads 48 times

PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।

Word-Meaning: - (वाजः) वह बलवान् [परमेश्वर] (उत्) उत्तमता से (आ गन्) प्राप्त हुआ है, (यः) जो (अप्सु अन्तः) प्रजाओं के भीतर है, [हे राजन् !] (विशः) उन प्रजाओं पर (आ रोह) ऊँचा हो, (याः) जो [प्रजाएँ] (त्वद्योनयः) तुझ से मेल रखनेवाली हैं। (सोमम्) ऐश्वर्य, (अपः) कर्म्म, (ओषधीः) ओषधियों [अन्न, सोमलता आदि] और (गाः) गौ आदि को (दधानः) धारण करता हुआ तू (चतुष्पदः) चौपायों और (द्विपदः) दोपायों को (इह) यहाँ [प्रजाओं में] (आ वेशय) प्रवेश करा ॥२॥
Connotation: - राजा को योग्य है कि सर्वनियामक परमेश्वर का ध्यान में रख कर अपनी प्रजा का पालन करे और योग्यता और कार्य्यदक्षता से अपनी और प्रजा की आवश्यक सम्पत्ति, जैसे अन्न, गौ, घोड़ा, हाथी, मनुष्य आदि को बढ़ावे ॥२॥
Footnote: २−(उत्) उत्तमतया (वाजः) वाज-अर्शआद्यच्। बलवान् परमेश्वरः (आगन्) अ० ३।४।१। आगमत् (यः) (अप्सु) म० १। प्रजासु (अन्तः) मध्ये (विशः) प्रजाः (आरोह) अधितिष्ठ (त्वद्योनयः) वहिश्रिश्रुयु०। उ० ४।५१। यु मिश्रणामिश्रणयोः-नि। योनिर्गृहनाम-निघ० ३।४। त्वया सह मिश्रिताः (याः) प्रजाः (सोमम्) ऐश्वर्यम् (दधानः) धारयन् (अपः) आपः कर्माख्यायां ह्रस्वो नुट् च वा। उ० ४।२०८। आप्लृ व्याप्तौ-असुन् ह्रस्वश्च। कर्म-निघ० २।१। (ओषधीः) अन्नसोमलतादिपदार्थान् (गाः) गवादिपशून् (चतुष्पदः) पादचतुष्टयोपेतान् (द्विपदः) पादद्वयोपेतान् (आवेशय) आनीय प्रवेशय (इह) अत्र। प्रजासु ॥