Go To Mantra
Viewed 113 times

आ॒दाय॑ जी॒तं जी॒ताय॑ लो॒केमुष्मि॒न्प्र य॑च्छसि ॥

Mantra Audio
Pad Path

आऽदाय । जीतम् । जीताय । लोके । अमुष्मिन् । प्र । यच्छसि ॥१०.११॥

Atharvaveda » Kand:12» Sukta:5» Paryayah:0» Mantra:57


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।

Word-Meaning: - [हे वेदवाणी !] (जीतम्) हानिकारक पुरुष को (आदाय) लेकर (जीताय) हान किये गये पुरुष के वश में (अमुष्मिन् लोके) उस लोक में [आगामी समय वा जन्म में] (प्र यच्छसि) तू देती है ॥५७॥
Connotation: - जो कोई वेदविरोधी वेदानुयायी को क्लेश देता है, वह परमेश्वरनियम से इस जन्म वा पर जन्म में उस सत्पुरुष के अधीन होता है, अर्थात् सत्य धर्म का सदा विजय होता है ॥५७॥
Footnote: ५७−(आदाय) गृहीत्वा (जीतम्) ज्या वयोहानौ कर्तरि−क्त, तकारस्य नत्वाभावः। हानिकर्तारम् (जीताय) कर्मणि−क्त। हानिं गताय पुरुषाय (लोके) संसारे जन्मनि वा (अमुष्मिन्) परस्मिन् (प्र यच्छसि) ददासि ॥