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श॒र्वः क्रु॒द्धः पि॒श्यमा॑ना॒ शिमि॑दा पिशि॒ता ॥

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शर्व: । क्रुध्द: । पिश्यमाना । शिमिदा । पिशिता ॥८.९॥

Atharvaveda » Kand:12» Sukta:5» Paryayah:0» Mantra:36


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।

Word-Meaning: - यह [वेदवाणी] (पिश्यमाना) खण्ड-खण्ड की जाती हुई [वेदनिन्दक के लिये] (क्रुद्धः) क्रोध करते हुए (शर्वः) हिंसक [पुरुष के समान], और (पिशिता) खण्ड-खण्ड की गयी (शिमिदा) विहित कर्म नाश करनेवाली होती है ॥३६॥
Connotation: - नास्तिक जन वेद का खण्डन करने के कारण आत्महिंसक और सत्कर्मनाशक हो जाता है ॥३६॥
Footnote: ३६−(शर्वः) शॄ हिंसायाम्−व प्रत्ययः। हिंसकः पुरुषः (क्रुद्धः) कुपितः (पिश्यमाना) पिश अवयवे। अवयवीक्रियमाणा (शिमिदा) शमु उपशमे−इन् वा ङीप्+दाप् लवने−क, टाप्। विहितकर्मनाशिका। शिमीति कर्मनाम शमयतेर्वा शक्नोतेर्वा−निरु० ५।१२। (पिशिता) अवयवीकृता ॥