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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
Word-Meaning: - (उत) और (इन्द्रेण) ऐश्वर्यवान् [ब्रह्मचारी] से (याचितः) याचना किये हुए (भेदः) फूट डालनेवाले ने (एनाम्) इस (वशाम्) [कामनायोग्य वेदवाणी] को (न अददात्) नहीं दिया। (देवाः) विद्वानों ने (तस्मात् आगसः) उस पाप से (अहमुत्तरे) संग्राम में [जहाँ अपनी-अपनी बड़ाई के लिये झगड़ते हैं] (तम्) उस [वेदशत्रु] को (अवृश्चन्) छिन्न-भिन्न किया है ॥५०॥
Connotation: - जो मनुष्य वेदविद्या के दान को रोकता है, विद्वान् लोग उस जगत् के हानिकारक को नष्ट कर देते हैं ॥५०॥
Footnote: ५०−(उत) अपि च (एनम्) (भेदः) म० ४९। भेदकः। कुटिलः (न) निषेधे (अददात्) दत्तवान् (वशाम्) कमनीयां वेदवाणीम् (इन्द्रेण) परमैश्वर्यवता ब्रह्मचारिणा (याचितः) प्रार्थितः (तम्) (देवाः) विद्वांसः (आगसः) पापात् (अवृश्चन्) छिन्नभिन्नं कृतवन्तः (अहमुत्तरे) अ० ४।२२।१। अहम्+उत्तरे। अहमुत्तरो भवामि अहमुत्तरो भवामीति कथनं यत्र। परस्परोत्कर्षाय योधानां धावनकर्मणि। महासंग्रामे ॥
