Reads 37 times
PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
Word-Meaning: - (पुरोडाशवत्सा) बढ़कर दान करने [वा उत्तम अन्न पाने] के लिये उपदेश करनेवाली, (सुदुघा) सुन्दर रीति से पूर्ण करनेवाली (वशा) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] (लोके) संसार में (अस्मै) उस पुरुष के लिये (उप तिष्ठति) उपस्थित होती है। (सा) वह (अस्मै) इस (प्रददुषे) बड़े दानी के लिये (सर्वान्) सब (कामान्) श्रेष्ठ कामनाएँ (दुहे) पूरी करती है ॥३५॥
Connotation: - मनुष्य सब गुणों की खान वेदविद्या के अभ्यास और प्रकाश से धार्मिक होकर अपनी सब कामनाएँ पूरी करता है ॥३५॥
Footnote: ३५−(पुरोडाशवत्सा) पुरो अप्रे दाश्यते दीयते, दाशृ दाने−घञ्+वृतॄवदिवचिवसि०। उ० ३।६२। वद व्यक्तायां वाचि−स, टाप्। पुरोडाशाय उत्तमदानाय परिपक्वान्नाय वा वदत्युपदिशति या सा (सुदुघा) अ० ७।७३।७। यथाविधि पूरयित्री। कामदा (लोके) संसारे (अस्मै) पुरुषाय (उपतिष्ठति) उपस्थिता भवति (सा) (अस्मै) (सर्वान्) (कामान्) श्रेष्ठाभिलाषान् (वशा) (प्रददुषे) प्रकर्षेण दत्तवते (दुहे) दुग्धे। प्रपूरयति ॥
