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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
Word-Meaning: - (यः) जो [मूर्ख] (देवानाम्) विजय चाहनेवालों के (निहितम्) नियम से रक्खे हुए (निधिम्) निधि, (एनाम्) इस [वेदवाणी] को (अवशाम्) नहीं कामनायोग्य [वा असमर्थ] (आह) बताता है। (तस्मै) उस [पुरुष] के लिये (उभौ) दोनों (भवाशर्वौ) भव [सुख देनेवाला प्राण] और शर्व [दोष मिटानेवाला अपान वायु] (परिक्रम्य) घूम-घूमकर (इषुम्) तीर [अर्थात् पीड़ा] (अस्यतः) फेंकते हैं ॥१७॥
Connotation: - जो मनुष्य वेदवाणी के गुण न जानकर अपने आत्मा को दूषित करता है, श्वास-प्रश्वास की असावधानी से उसकी शारीरिक अवस्था भी बिगड़ जाती है ॥१७॥
Footnote: १७−(यः) मूर्खः (एनाम्) वेदवाणीम् (अवशाम्) म० १। अकमनीयाम्। असमर्थाम् (आह) कथयति (देवानाम्) विजिगीषूणाम् (निहितम्) नियमेन स्थापितम् (निधिम्) धनकोशम् (उभौ) (तस्मै) मूर्खाय (भवाशर्वौ) अ० ८।२।७। सुखस्य भावयिता कर्ता भवः प्राणः, दुःखस्य शारिता नाशकः शर्वोऽपानवायुश्च तौ (परिक्रम्य) परितो गत्वा (इषुम्) बाणम्। पीडाम् (अस्यतः) क्षिपतः ॥
