Reads 41 times
PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
Word-Meaning: - “(वशाम्) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] (याचद्भ्यः) माँगनेवाले (ब्रह्मभ्यः) ब्रह्माओं [वेदजिज्ञासुओं] को (ददामि) मैं देता हूँ, (च) निश्चय करके (एनाम्) इस [वेदवाणी] को (अनु) ध्यान देकर (अभुत्सत) उन [पूर्व ऋषियों] ने जाना है, (तत्) यह [विद्यादान] (प्रजावत्) श्रेष्ठ प्रजाओंवाला [और] (अपत्यवत्) उत्तम सन्तानोंवाला है−(इति) बस (एव) ऐसा (ब्रूयात्) वह [आचार्य] कहे ॥१॥
Connotation: - आचार्य अधिकारी ब्रह्मचारियों को निश्चय करावे कि पूर्व ऋषियों ने वेद को मनन करके माना है कि वेदविद्या के अभ्यास से संसार के सब मनुष्य और सन्तान उत्तम होते हैं, उसी का उपदेश तुम को मैं करता हूँ ॥१॥ इस वशासूक्त का मिलान−अथर्व० का० १० सू० १० [वशासूक्त] से करो ॥
Footnote: १−(ददामि) प्रयच्छामि (इति) वाक्यसमाप्तौ (एव) एवम् (ब्रूयात्) उपदिशेत्−आचार्यः (अनु) अनुलक्ष्य (च) अवधारणे (एनाम्) वेदवाणीम् (अभुत्सत) बुध अवगमने−लुङ्। ज्ञातवन्तः−पूर्वे विद्वांसः (वशाम्) अ० १०।१०।२। वशिरण्योरुपसंख्यानम्। वा० पा० ३।३।५८। वश कान्तौ प्रभुत्वे च−अप्, टाप्। वशा स्वाधीना−महीधरभाष्ये−यजु० २।१६। वशा कमनीयानि−दयानन्दभाष्ये, ऋक्० २।२४।१३। कमनीयां प्रभ्वीं वा वेदवाणीम् (ब्रह्मभ्यः) ब्राह्मणेभ्यः। ब्रह्मजिज्ञासुभ्यः (याचद्भ्यः) प्रार्थयमानेभ्यः (तत्) विद्यादानम् (प्रजावत्) प्रशस्यप्रजायुक्तम् (अपत्यवत्) श्रेष्ठसन्तानोपेतं कर्म ॥
