परस्पर उन्नति करने का उपदेश।
Word-Meaning: - (त्वचाम्) त्वचाओं [शरीर की खालों] में से (एषा) यह (पुरुषे) पुरुष [शरीर] पर (सम् बभूव) मिली है, और (वे) जो (अन्ये) दूसरे (पशवः) जीव हैं, (सर्वे) वे सब [भी] (अनग्नाः) बिना नंगे [खालवाले] हैं। [हे स्त्री-पुरुषो !] तुम दोनों (क्षत्रेण) हानि से बचानेवाले बल से (आत्मानम्) अपने को (परि धापयाथः) ढँपवाओ, [जैसे] (अमोतम्) ज्ञान से बुना हुआ (वासः) कपड़ा (ओदनस्य) अन्न आदि का (मुखम्) मुख्य [रक्षासाधन] है ॥५१॥
Connotation: - मनुष्यों में मनुष्य शरीर और अन्य जीवों में अन्य प्रकार के शरीर व्यक्तिसूचक हैं, किन्तु मनुष्य ही परमात्मा के ज्ञान से मनुष्यत्व पाकर उन्नति करते हैं, जैसे समझ-बूझकर बनाया हुआ वस्त्र पदार्थों के रखने में समर्थ होता है ॥५१॥