परस्पर उन्नति करने का उपदेश।
Word-Meaning: - (पुत्रासः) हे पुत्रो ! [नरक से बचानेवालो !] (जीवधन्याः) जीवों में धन्य [बड़ाई योग्य] तुम सब ! (इमम् जीवम्) इस जीवते [जीवात्मा] से (समेत्य) समागम करके, (आपः=अपः) आप्त प्रजाओं में (अभि) सब ओर (सम्) मिलते हुए (विशध्वम्) प्रवेश करो। (तासाम्) उन [प्रजाओं] के बीच (अमृतम्) उस अमर [परमात्मा] को (भजध्वम्) तुम सब सेवो, (यम्) जिस को (ओदनम्) ओदन [सुख बरसानेवाला वा मेघरूप परमेश्वर] (आहुः) वे [विद्वान्] कहते हैं, (यम्) जिस को (वाम्) तुम दोनों की (जनित्रीः) उत्पन्न करनेवाली [जन्मव्यवस्था] (पचति) परिपक्व [दृढ़] करती है ॥४॥
Connotation: - हे मनुष्यो ! तुम अपने जीवित पुरुषार्थी आत्मा को पहिचानकर प्रजाओं को कष्टों से छुड़ाओ, और अविनाशी परमात्मा का सदा ध्यान रक्खो, उसने अपनी न्यायव्यवस्था से तुम को उत्तम स्त्री और पुरुष बनाया है ॥४॥