Go To Mantra

ष॒ष्ट्यां श॒रत्सु॑ निधि॒पा अ॒भीच्छा॒त्स्वः प॒क्वेना॒भ्यश्नवातै। उपै॑नं जीवान्पि॒तर॑श्च पु॒त्रा ए॒तं स्व॒र्गं ग॑म॒यान्त॑म॒ग्नेः ॥

Mantra Audio
Pad Path

षष्ट्याम् । शरत्ऽसु । निधिऽपा: । अभि । इच्छात् । स्व: । पक्वेन । अभि । अश्नवातै । उप । एनम् । जीवान् । पितर: । च । पुत्रा: । एतम् । स्व:ऽगम् । गमय । अन्तम् । अग्ने: ॥३.३४॥

Atharvaveda » Kand:12» Sukta:3» Paryayah:0» Mantra:34


Reads 45 times

PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

परस्पर उन्नति करने का उपदेश।

Word-Meaning: - (षष्ठ्याम्) साठ [बहुत] (शरत्सु) बरसों में (निधिपाः) निधियों का रक्षक [मनुष्य] (स्वः) सुख को (पक्वेन) परिपक्व [ज्ञान] के साथ (अभि इच्छात्) सब ओर खोजे और (अभि) सब प्रकार (अश्नवातै) प्राप्त करे। (पितरः) पितर [रक्षक ज्ञानी] (च) और (पुत्राः) पुत्र [कष्ट से बचानेवाले लोग] (एनम्) इस [वीर] के (उप जीवान्) आश्रय से जीवते रहें, [हे परमेश्वर !] (एतम्) इस [वीर] को (अग्नेः) ज्ञान के (अन्तम्) अन्त [सीमा], (स्वर्गम्) सुख समाज में (गमय) पहुँचा ॥३४॥
Connotation: - जो मनुष्य बड़े अभ्यास से परिपक्व ज्ञानी होकर मोक्षसुख पाता है, उस विद्वान् वीर पुरुष का सब विद्वान् लोग आश्रय लेते हैं, और वह परमेश्वर के अनुग्रह से सब का अग्रगामी होकर आनन्दित होता है ॥३४॥ इस मन्त्र का प्रथम पाद आगे मन्त्र ४१ में है ॥
Footnote: ३४−(षष्ठ्याम्) षष्टिसंख्यायुक्तासु। अनेकासु इत्यर्थः (शरत्सु) संवत्सरेषु (निधिपाः) निधिपालकः (अभि इच्छात्) अन्विच्छेत् (स्वः) सुखम् (पक्वेन) दृढज्ञानेन (अभि) (अश्नवातै) प्राप्नुयात् (एनम्) विद्वांसम् (उप जीवान्) लेट्। उपेत्य जीवन्तु (पितरः) पालका विज्ञानिनः (च) (पुत्राः) पुतो नरकात् त्रायकाः पुरुषाः (एतम्) (विद्वांसम्) (स्वर्गम्) सुखप्रापकं लोकम् (गमय) प्रापय (अन्तम्) सीमाम् (अग्नेः) ज्ञानस्य ॥