Go To Mantra

वै॑श्वदे॒वीं वर्च॑सा॒ आ र॑भध्वं शु॒द्धा भव॑न्तः॒ शुच॑यः पाव॒काः। अ॑ति॒क्राम॑न्तो दुरि॒ता प॒दानि॑ श॒तं हिमाः॒ सर्व॑वीरा मदेम ॥

Mantra Audio
Pad Path

वैश्वऽदेवीम् । वर्चसे । आ । रभध्वम् । शुध्दा: । भवन्त: । शुचय: । पावका: । अतिऽक्रामन्त: । दु:ऽइता । पदानि । शतम् । हिमा: । सर्वऽवीरा: । मदेम ॥२.२८॥

Atharvaveda » Kand:12» Sukta:2» Paryayah:0» Mantra:28


Reads 44 times

PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

Word-Meaning: - [हे मनुष्यो !] (वैश्वदेवीम्) सब विद्वानों के हित करनेवाली [वेदवाणी] को (वर्चसे) तेज पाने के लिये तुम (शुद्धाः) शुद्ध, (शुचयः) पवित्र (पावकाः) शुद्ध करनेवाले (भवन्तः) होते हुए (आ रभध्वम्) आरम्भ करो। (दुरिता) कठिन [कष्टदायक] (पदानि) पगडण्डियों को (अतिक्रामन्तः) लाँघते हुए, (सर्ववीराः) सब को वीर रखते हुए हम (शतम्) सौ (हिमाः) शीत ऋतुओंवाली [स्थितियों] तक (मदेम) सुख भोगें ॥२८॥
Connotation: - मनुष्यों को योग्य है कि वेदवाणी के निरन्तर विचार से बाहिर और भीतर से शुद्ध होकर और दूसरों को शुद्ध करके कुमार्गों को त्याग कर सब को वीर बनाते हुए पूर्ण आयु भोगें ॥२८॥ इस मन्त्र का मिलान करो−अ० ६।६२।३ ॥
Footnote: २८−(वैश्वदेवीम्) तस्मै हितम्। पा० ५।१।५। विश्वदेव−अण्, ङीप्। सर्वेभ्यो विद्वद्भ्यो हिताम् (वर्चसे) तेजसे (आरभध्वम्) आरम्भं कुरुत (शुद्धाः) (भवन्तः) सन्तः (शुचयः) (पावकाः) संशोधकाः (अतिक्रामन्तः) उल्लङ्घयन्तः (दुरिता) दुर्गतानि। कष्टप्रदानि (पदानि) पदचिह्नानि। क्षुद्रमार्गान् (शतम्) (हिमाः) हिम+अर्शआद्यच्, टाप्। शीतकालयुक्ताः स्थितीः (सर्ववीराः) सर्ववीरोपेताः (मदेम) हृष्येम ॥