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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
Word-Meaning: - (यस्मिन्) जिस [ज्ञान] में (देवाः) विजय चाहनेवाले (उत) और (यस्मिन्) जिस [ज्ञान] में (मनुष्याः) मननशील पुरुष (अमृजत) शुद्ध हुए हैं। (तस्मिन्) उस [ज्ञान] में (मृष्ट्वा) शुद्ध होकर, (अग्ने) हे अग्नि [समान तेजस्वी राजन् !] (घृतस्तावः) ज्ञानप्रकाश की स्तुति करनेवाला (त्वम्) तू (दिवम्) आनन्द में (आ रुह) ऊँचा हो ॥१७॥
Connotation: - जो मनुष्य पूर्वज महात्माओं के अनुकरण से आत्मा को शुद्ध करते हैं, वे अत्यन्त आनन्द पाते हैं ॥१७॥
Footnote: १७−(यस्मिन्) ज्ञाने (देवाः) विजिगीषवः (अमृजत) शुद्धा अभवन् (यस्मिन्) (मनुष्याः) मननशीलाः (उत) अपि (तस्मिन्) ज्ञाने (घृतस्तावः) घृतस्य ज्ञानप्रकाशस्य स्तावः स्तुतिर्यस्य सः (मृष्ट्वा) शुद्ध्वा (त्वम्) (अग्ने) हे अग्निवत्तेजस्विन् राजन् (दिवम्) मोदम्। हर्षम् (आ रुह) अधितिष्ठ ॥
