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अ॒स्मिन्व॒यं संक॑सुके अ॒ग्नौ रि॒प्राणि॑ मृज्महे। अभू॑म य॒ज्ञियाः॑ शु॒द्धाः प्र ण॒ आयूं॑षि तारिषत् ॥

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Pad Path

अस्मिन् । वयम् । सम्ऽकसुके । अग्नौ । रिप्राणि । मृज्महे । अभूम । यज्ञिया: । शुध्दा: । प्र । न: । आयूंषि । तारिषत् ॥२.१३॥

Atharvaveda » Kand:12» Sukta:2» Paryayah:0» Mantra:13


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

Word-Meaning: - (अस्मिन्) इस (संकसुके) यथावत् शासक (अग्नौ) अग्नि [समान प्रतापी राजा] में [अर्थात् उसके आश्रय से] (रिप्राणि) पापों को (वयम्) हम (मृज्महे) धोते हैं। हम (यज्ञियाः) संगति के योग्य, (शुद्धाः) शुद्ध आचरणवाले (अभूम) हो गये हैं, वह (नः) हमारे (आयूंषि) जीवन को (प्र तारिषत्) बढ़ा देवे ॥१३॥
Connotation: - मनुष्यों को योग्य है कि धर्मात्मा शासक के अनुशासन में रह कर विद्या और पुरुषार्थ से परस्पर मेल के साथ अपने जीवनों को सुफल करें ॥१३॥
Footnote: १३−(अस्मिन्) (वयम्) (संकसुके) म० ११। सम्यक् शासके (अग्नौ) अग्निवत्प्रतापिनि राजनि (रिप्राणि) पापानि (मृज्महे) शोधयामः (अभूम) (यज्ञियाः) संगतियोग्याः (शुद्धाः) शुद्धाचरणाः (नः) अस्माकम् (आयूंषि) जीवनानि (प्रतारिषत्) अ० २।४।६। प्रवर्धयेत् ॥