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त्वम॑स्या॒वप॑नी॒ जना॑ना॒मदि॑तिः काम॒दुघा॑ पप्रथा॒ना। यत्त॑ ऊ॒नं तत्त॒ आ पू॑रयाति प्र॒जाप॑तिः प्रथम॒जा ऋ॒तस्य॑ ॥

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Pad Path

त्वम् । असि । आऽवपनी । जनानाम् । अदिति: । कामऽदुघा । पप्रथाना । यत् । ते । ऊनम् । तत् । ते । आ । पूरयति । प्रजाऽपति: । प्रथमऽजा: । ऋतस्य ॥१.६१॥

Atharvaveda » Kand:12» Sukta:1» Paryayah:0» Mantra:61


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

राज्य की रक्षा का उपदेश।

Word-Meaning: - [हे पृथिवी !] (त्वम्) तू (आवपनी) बड़ी उपजाऊ होकर (जनानाम्) मनुष्यों की (अदितिः) अखण्डव्रता, (कामदुघा) कामना पूरी करनेवाली (पप्रथाना) प्रख्यात (असि) है। (यत्) जो (ते) तेरा (ऊतम्) न्यून है, (ऋतस्य) यथावत् नियम का (प्रथमजाः) पहिले उत्पन्न करनेवाला (प्रजापतिः) प्रजापति [जगत्पालक परमेश्वर] (ते) तेरे (तत्) उस [न्यून भाग] को (आ) सब प्रकार (पूरयाति) पूरा करे ॥६१॥
Connotation: - जैसे परमेश्वर ने पृथिवी में अन्न आदि से प्राणियों की पालन शक्ति दी है, वैसे ही प्राणी जो कुछ खाते-पीते हैं, वह न्यूनता ईश्वरनियम से वृष्टि आदि द्वारा पूर्ण हो जाती है ॥६१॥
Footnote: ६१−(त्वम्) (असि) (आवपनी) समन्ताद् बीजजनयित्री (जनानाम्) मनुष्याणाम् (अदितिः) अखण्डव्रता (कामदुघा) अ० ४।३४।८। मनोरथपूरयित्री (पप्रथाना) प्रथ प्रख्याने−कानच्। प्रख्याता (यत्) (ते) तव (ऊतम्) न्यूनम्। हीनम् (तत्) (ते) तव (आ) समन्तात् (पूरयाति) पूरयेत् (प्रजापतिः) जगत्पालकः परमेश्वरः (प्रथमजाः) अ० २।१।४। जन जनने−विट्, आत्त्वम्। प्रथमजनयिता (ऋतस्य) सत्यनियमस्य ॥