Go To Mantra
Viewed 84 times

वि॑श्वंभ॒रा व॑सु॒धानी॑ प्रति॒ष्ठा हिर॑ण्यवक्षा॒ जग॑तो नि॒वेश॑नी। वै॑श्वान॒रं बिभ्र॑ती॒ भूमि॑र॒ग्निमिन्द्रऋ॑षभा॒ द्रवि॑णे नो दधातु ॥

Mantra Audio
Pad Path

विश्वम्ऽभरा । वसुऽधानी । प्रतिऽस्था । हिरण्यऽवक्षा: । जगत: । निऽवेशनी । वैश्वानरम् । बिभ्रती । भूमि: । अग्निम् । इन्द्रऽऋषभा । द्रविणे । न: । दधातु ॥१.६॥

Atharvaveda » Kand:12» Sukta:1» Paryayah:0» Mantra:6


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

राज्य की रक्षा का उपदेश।

Word-Meaning: - (विश्वम्भरा) सब को सहारा देनेवाली, (वसुधानी) धनों की रखनेवाली (प्रतिष्ठा) दृढ़ आधार (हिरण्यवक्षाः) सुवर्ण छाती में रखनेवाली, (जगतः) चलनेवाले [उद्योगी] की (निवेशनी) सुख देनेवाली, (वैश्वानरम्) सब नरों के हितकारी (अग्निम्) अग्नि [समान प्रतापी मनुष्य] की (बिभ्रती) पोषण करनेवाली, (इन्द्रऋषभा) इन्द्र [परमात्मा वा मनुष्य वा सूर्य] को प्रधान माननेवाली (भूमिः) भूमि (द्रविणे) बल [वा धन] के बीच (नः) हम को (दधातु) रक्खे ॥६॥
Connotation: - जो मनुष्य उद्योग करते हैं, वे भूपति होकर इस वसुधा पृथिवी पर सोना-चाँदी आदि की प्राप्ति से बली और धनी होकर सुख पाते हैं ॥६॥
Footnote: ६−(विश्वम्भरा) संज्ञायां भृतॄवृजि०। पा०। ३।२।४६। विश्व+डुभृञ् धारणपोषणयोः−खच्, मुम्। सर्वधात्री (वसुधानी) धनानां धर्त्री (प्रतिष्ठा) दृढाधारभूता (हिरण्यवक्षाः) सुवर्णादीनि वक्षसि मध्ये यस्याः सा (जगतः) जङ्गमस्य गतिमतः पुरुषस्य (निवेशनी) सुखस्य प्रवेशयित्री दात्री (वैश्वानरं) सर्वनरहितम् (बिभ्रती) पोषयन्ती (भूमिः) (अग्निम्) अग्निवत्प्रतापिनं मनुष्यम् (इन्द्रऋषभा) इन्द्रः परमेश्वरो मनुष्यः सूर्यो वा ऋषभः। प्रधानो यस्याः सा (द्रविणे) बले−निघ० २।९। धने−निघ० २।१०। (नः) अस्मान् (दधातु) धरतु ॥