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शु॒द्धा न॒ आप॑स्त॒न्वे क्षरन्तु॒ यो नः॒ सेदु॒रप्रि॑ये॒ तं नि द॑ध्मः। प॒वित्रे॑ण पृथिवि॒ मोत्पु॑नामि ॥

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शुध्दा: । न: । आप: । तन्वे । क्षरन्तु । य: । न: । सेदु: । अप्रिये । तम् । नि । दध्म: । पवित्रेण । पृथिवि । मा । उत् । पुनामि ॥१.३०॥

Atharvaveda » Kand:12» Sukta:1» Paryayah:0» Mantra:30


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

राज्य की रक्षा का उपदेश।

Word-Meaning: - (शुद्धाः) शुद्ध (आपः) जल (नः) हमारे (तन्वे) शरीर के लिये (क्षरन्तु) बहें, (यः) जो (नः) हमारा (सेदुः) नाश करने का व्यवहार है, (तम्) उस [व्यवहार] को (अप्रिये) [अपने] अप्रिय [शत्रु] पर (नि दध्मः) हम डालते हैं। (पृथिवि) हे पृथिवी ! (पवित्रेण) शुद्ध व्यवहार से (मा) अपने को (उत् पुनामि) सर्वथा शुद्ध करता हूँ ॥३०॥
Connotation: - जैसे निर्मल जल से शरीर शुद्ध करके मल का नाश करते हैं, वैसे ही मनुष्य अन्तःकरण का मल दूर करके पृथिवी पर धार्मिक व्यवहार से आत्मा की शुद्धि करें ॥३०॥
Footnote: ३०−(शुद्धाः) निर्मलाः (नः) अस्माकम् (आपः) जलानि (तन्वे) शरीराय (क्षरन्तु) वहन्तु (यः) (नः) अस्माकम् (सेदुः) कुर्भ्रश्च। उ० १।२२। षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु−कु, अकारस्य एकारः पृषोदरादित्वात्। अवसादनस्य नाशनस्य व्यवहारः (अप्रिये) शत्रौ (तम्) सेदुम् (नि दध्मः) नितरां धारयामः (पवित्रेण) शुद्धकर्मणा (पृथिवी) (मा) माम् (उत्) उत्कर्षेण (पुनामि) शोधयामि ॥