राजा और प्रजा के कर्त्तव्य का उपदेश।
Word-Meaning: - (खडूरे) खङ्ग [तरवार] पर (अधिचङ्क्रमाम्) निधड़क चढ़ जानेवाली, (खर्विकाम्) अभिमानिनी, (खर्ववासिनीम्) खर्वों [बहुत गिनती मनुष्यों] में रहनेवाली [सेना] को और (ये) जो (उदाराः) उदार [दानशील] (च) और (ये) जो (अन्तर्हिताः) अन्तःकरण से हितकारी (गन्धर्वाप्सरसः) गन्धर्व [पृथिवी के धारण करनेवाले] और अप्सर [प्रजाओं वा आकाश में चलनेवाले विवेकी लोग हैं, उनको, दिखा-म० १५] और [जो] (सर्पाः) सर्प [के समान हिंसक], (इतरजनाः) पामरजन (रक्षांसि) राक्षस हैं [उनको, कँपा दे-म० १८] ॥१६॥
Connotation: - इस मन्त्र में (दर्शय) [दिखा] मन्त्र १५ से और (उत् वेपय) (कँपा दे) क्रिया पद-मन्त्र १८ से लाया गया है। राजा अपनी सुनीति से सुशिक्षित वीर सेना और हितैषी, भूमिविद्या और आकाशविद्या जाननेवाले विज्ञानियों द्वारा दुष्टों को दण्ड देवे, जिससे शत्रु लोग पृथिवी वा आकाशमार्ग से कष्ट न दे सकें ॥१६॥