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तप॑श्चै॒वास्तां॒ कर्म॑ चा॒न्तर्म॑ह॒त्यर्ण॒वे। तपो॑ ह जज्ञे॒ कर्म॑ण॒स्तत्ते ज्ये॒ष्ठमुपा॑सत ॥

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Pad Path

तप: । च । एव । आस्ताम् । कर्म । च । अन्त: । महत‍ि । अर्णवे । तप: । ह । जज्ञे । कर्मण: । तत् । ते । ज्येष्ठम् । उप । आसत ॥१०.६॥

Atharvaveda » Kand:11» Sukta:8» Paryayah:0» Mantra:6


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।

Word-Meaning: - (तपः) तप [ईश्वर का सामर्थ्य] (च च) और (कर्म) कर्म [प्राणियों के कर्म का फल] (एव) ही (महति अर्णवे अन्तः) बड़े समुद्र [परमेश्वर के गम्भीर सामर्थ्य] के भीतर (आस्ताम्) दोनों थे। (तपः) तप [ईश्वर का सामर्थ्य] (ह) निश्चय करके (कर्मणः) कर्म [कर्म के फल अनुसार शरीर, स्वभाव आदि रचना] से (जज्ञे) प्रकट हुआ है, (तत्) सो (ते) उन्होंने [ऋतु आदिकों ने-म० ५] (ज्येष्ठम्) सर्वश्रेष्ठ परमात्मा को (उप आसत) पूजा है ॥६॥
Connotation: - प्रलय में प्राणियों के कर्म फल और ईश्वरसामर्थ्य भी ईश्वर सामर्थ्य में रक्षित थे। फिर सृष्टिकाल में कर्मफलों के अनुसार प्राणियों के विविध प्रकार शरीर और स्वभाव प्रकट हुए। उससे परमात्मा ही सर्वनियन्ता प्रतीत हुआ ॥६॥इस मन्त्र का पूर्वार्द्ध ऊपर म० २ में आ चुका है ॥
Footnote: ६−(तपः) ईश्वरसामर्थ्यम् (ह) एव (जज्ञे) प्रादुर्बभूव (कर्मणः) कर्मफलानुसारेण शरीरस्वभावादिरचनारूपात् कर्मसकाशात् (तत्) तदा (ते) ऋतुधात्रादयः-म० ५। (ज्येष्ठम्) सर्वोत्कृष्टं परमात्मानम् (उपासत) पूजितवन्तः। अन्यत् पूर्ववत्-म० २ ॥