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ब्र॑ह्मचा॒र्येति स॒मिधा॒ समि॑द्धः॒ कार्ष्णं॒ वसा॑नो दीक्षि॒तो दी॒र्घश्म॑श्रुः। स स॒द्य ए॑ति॒ पूर्व॑स्मा॒दुत्त॑रं समु॒द्रं लो॒कान्त्सं॒गृभ्य॒ मुहु॑रा॒चरि॑क्रत् ॥

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Pad Path

ब्रह्मऽचारी । एति । सम्ऽइधा । सम्ऽइध्द: । कार्ष्णम् । वसान: । दीक्षित: । दीर्घऽश्मश्रु: । स: । सद्य: । एति । पूर्वस्मात् । उत्तरम् । समुद्रम् । लोकान् । सम्ऽगृभ्य । मुहु: । आऽचरिक्रत् ॥७.६॥

Atharvaveda » Kand:11» Sukta:5» Paryayah:0» Mantra:6


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

ब्रह्मचर्य के महत्त्व का उपदेश।

Word-Meaning: - (ब्रह्मचारी) ब्रह्मचारी (समिधा) [विद्या के] प्रकाश से (समिद्धः) प्रकाशित, (कार्ष्णम्) कृष्ण मृग का चर्म (वसानः) धारण किये हुए (दीक्षितः) दीक्षित होकर [व्रत धारण करके] (दीर्घश्मश्रुः) बड़े-बड़े दाढ़ी-मूछ रखाये हुए (एति) चलता है। (सः) वह (सद्यः) अभी (पूर्वस्मात्) पहिले [समुद्र] से [अर्थात् ब्रह्मचर्याश्रम से] (उत्तरम् समुद्रम्) पिछले समुद्र [गृहाश्रम] को (एति) प्राप्त होता है और (लोकान्) लोगों को (संगृभ्य) संग्रह करके (मुहुः) बारम्बार (आचरिक्रत्) अतिशय करके पुकारता रहे ॥६॥
Connotation: - ब्रह्मचारी वस्त्र और केश आदि शारीरिक बाहिरी बनावट की उपेक्षा करके सत्य धर्म और ब्रह्मचर्य से विद्या ग्रहण करके गृहाश्रम में प्रवेश करता हुआ लोगों में सत्य का प्रचार करे ॥६॥
Footnote: ६−(ब्रह्मचारी) म० १। ब्रह्मचर्येण युक्तः (एति) गच्छति (समिधा) ञिइन्धी दीप्तौ-क्विप्। विद्याप्रकाशेन (समिद्धः) प्रदीप्तः (कार्ष्णम्) कृष्णमृगचर्मः (वसानः) धारयन् (दीक्षितः) प्राप्तदीक्षः। धृतनियमः (दीर्घश्मश्रुः) लम्बमानमुखस्थलोमा (सः) ब्रह्मचारी (सद्यः) तत्क्षणम् (एति) आप्नोति (पूर्वस्मात्) प्रथमसमुद्ररूपाद् ब्रह्मचर्याश्रमात् (उत्तरम्) अनन्तम् (समुद्रम्) गृहाश्रमरूपं समुद्रम् (लोकान्) जनान् (संगृभ्य) संगृह्य (मुहुः) बारम्बारम् (आचरिक्रत्) आङ्+करोतेर्यङ्लुगन्ताल् लेटि रूपम्। लेटोऽडाटौ। पा० ३।४।९४। इत्यट्। इतश्च लोपः परस्मैपदेषु। पा० ३।४।९७। इकारलोपः। अतिशयेन आकारयेत् आह्वयेत् ॥