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ब्र॑ह्म॒चर्ये॑ण॒ तप॑सा दे॒वा मृ॒त्युमपा॑घ्नत। इन्द्रो॑ ह ब्रह्म॒चर्ये॑ण दे॒वेभ्यः॒ स्वराभ॑रत् ॥

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ब्रह्मऽचर्येण । तपसा । देवा: । मृत्युम् । अप । अघ्नत । इन्द्र: । ह । ब्रह्मऽचर्येण । देवेभ्य: । स्व: । आ । अभरत् ॥७.१९॥

Atharvaveda » Kand:11» Sukta:5» Paryayah:0» Mantra:19


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

ब्रह्मचर्य के महत्त्व का उपदेश।

Word-Meaning: - (ब्रह्मचर्येण) ब्रह्मचर्य [वेदाध्ययन और इन्द्रियदमन], (तपसा) तप से (देवाः) विद्वानों ने (मृत्युम्) मृत्यु [मृत्यु के कारण निरुत्साह, दरिद्रता आदि] को (अप) हटाकर (अघ्नत) नष्ट किया है। (ब्रह्मचर्येण) ब्रह्मचर्य [नियमपालन] से (ह) ही (इन्द्रः) सूर्य ने (देवेभ्यः) उत्तम पदार्थों के लिये (स्वः) सुख अर्थात् प्रकाश को (आ अभरत्) धारण किया है ॥१९॥
Connotation: - विद्वान् लोग वेदों को पढ़ने और इन्द्रियों को वश में करने से आलस्य, निर्धनता आदि दूर करके मोक्षसुख प्राप्त करते हैं, और सूर्य, ईश्वरनियम पूरा करके, अपने प्रकाश से संसार में उत्तम-उत्तम पदार्थ प्रकट करता है ॥१९॥
Footnote: १९−(ब्रह्मचर्येण) म० १७ (तपसा) तपश्चरणेन (देवाः) विद्वांसः (मृत्युम्) मरणकारणं निरुत्साहनिर्धनत्वादिकम् (अप) निवार्य (अघ्नत) नाशितवन्तः (इन्द्रः) सूर्यः (ह) एव (ब्रह्मचर्येण) ईश्वरनियमपालनेन (देवेभ्यः) उत्तमपदार्थानां प्राप्तये (स्वः) सुखं प्रकाशम् (आ) समन्तात् (अभरत्) धारितवान् ॥