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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
प्राण की महिमा का उपदेश।
Word-Meaning: - (आथर्वणीः) निश्चल स्वभाववाले महर्षियों की प्रकाशित की हुई और (आङ्गिरसीः) विज्ञानियों की बताई हुई (दैवीः) देव [मेघ] से उत्पन्न (उत) और (मनुष्यजाः) मनुष्यों से उत्पन्न (ओषधयः) ओषधें (प्र जायन्ते) उत्पन्न हो जाती हैं, (यदा) जब (त्वम्) तू, (प्राण) हे प्राण ! [जीवनदाता परमेश्वर] [उन को] (जिन्वसि) तृप्त करता है ॥१६॥
Connotation: - मेघ द्वारा स्वयं उत्पन्न और मनुष्य द्वारा खेती आदि से उत्पन्न अन्न और ओषधें परमेश्वर के सामर्थ्य से वृष्टि होने पर उत्पन्न होती हैं, जिनका प्रचार अनुभवी महात्मा लोग संसार में करते हैं ॥१६॥
Footnote: १६−(आथर्वणीः) अथर्वा व्याख्यातः-अ० ४।१।७। तेन प्रोक्तम्। पा० ४।३।१०१। इत्यण्, ङीप् जसि पूर्वसवर्णदीर्घः। अथर्वभिर्निश्चलबुद्धिभिः प्रकाशिताः (आङ्गिरसीः) अङ्गिरा व्याख्यातः-अ० २।१२।४। पुनः पूर्ववत् सिद्धिः। अङ्गिरोभिर्विज्ञानिभिः प्रोक्ताः (दैवीः) अ० १।१९।२। देव-अञ्, अन्यत् पूर्ववत् साधु। देवाद् मेघादागता व्युत्पन्नाः (मनुष्यजाः) क्षेत्राद् मनुष्येभ्य उत्पन्नाः (ओषधयः) नानाविधा अन्नाद्याः (प्रजायन्ते) प्रकर्षेणोत्पद्यन्ते। अन्यद्गतम्-म० १४ ॥
