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प्र॒त्यञ्चं॑ चैनं॒ प्राशी॑रपा॒नास्त्वा॑ हास्य॒न्तीत्ये॑नमाह ॥

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प्रत्यञ्चम् । च । एनम् । प्रऽआशी: । अपाना: । त्वा । हास्यन्ति । इति । एनम् । आह ॥३.२९॥

Atharvaveda » Kand:11» Sukta:3» Paryayah:0» Mantra:29


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

सृष्टि के पदार्थों के ज्ञान का उपदेश।

Word-Meaning: - “(च) यदि (प्रत्यञ्चम्) प्रत्यक्षवर्ती (एनम्) इस [ओदन] को (प्राशीः) तूने खाया है। (अपानाः) प्रश्वासबल (त्वा) तुझे (हास्यन्ति) त्यागेंगे (इति) ऐसा वह [आचार्य] (एनम्) इस [जिज्ञासु] से (आह) कहता है ॥२९॥
Connotation: - मन्त्र २६ का उत्तर है। आचार्य उपदेश करता है, जो मनुष्य परमेश्वर को दूरवर्ती वा समीपवर्ती अर्थात् एकस्थानी मानता है, वह श्वास और प्रश्वास से हीन होकर निर्बल हो जाता है ॥२९॥
Footnote: २९−(प्रत्यञ्चम्) म० २६। प्रत्यक्षवर्तिनम् (अपानाः) प्रश्वासबलानि। अन्यत् पूर्ववत् म० २८॥