ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।
Word-Meaning: - (भवाय) भव [सखोत्पादक परमेश्वर] को (चतुः) चार बार, (अष्टकृत्वः) आठ बार (नमः) नमस्कार है, (पशुपते) हे दृष्टिवाले [जीवों] के रक्षक ! (ते) तुझे (दश कृत्वः) दस बार (नमः) नमस्कार है। (तव) तेरे ही (विभक्ताः) बाँटे हुए (इमे) यह (पञ्च) पाँच (पशवः) दृष्टिवाले [जीव] (गावः) गौवें, (अश्वाः) घोड़े, (पुरुषाः) पुरुष और (अजावयः) बकरी और भेड़ें हैं ॥९॥
Connotation: - मनुष्य परमेश्वर को चार बार [ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास चार आश्रमों का ध्यान करके], आठ बार [यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि, आठ योग के अङ्गों का आश्रय लेकर−योगदर्शन, पाद २ सूत्र २९] और दस बार [पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय को वश में करके] नमस्कार करे। परमेश्वर ही कर्मानुसार गौ आदि पदार्थों को मनुष्यों के लिये बाँटता है ॥९॥