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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।
Word-Meaning: - [हे परमात्मन् !] (ते) तुझे (पुरस्तात्) आगे से, (उत्तरात्) ऊपर से (उत) और (अधरात्) नीचे से (नमः) नमस्कार, (ते) तुझे (दिवः) आकाश के (अभीवर्गात् परि) अवकाश से (अन्तरिक्षाय) अन्तरिक्ष लोक को जानने के लिये (नमः कृण्मः) हम नमस्कार करते हैं ॥४॥
Connotation: - मनुष्य परमेश्वर को सर्वत्र व्यापक जानकर विद्या की प्राप्ति से सब दिशाओं और अन्तरिक्ष के पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करके अपनी रक्षा करें ॥४॥
Footnote: ४−(पुरस्तात्) अग्रे वर्तमानाद् देशात् (ते) तुभ्यम् (उत्तरात्) उपरिस्थानात् (अधरात्) अधःस्थानात् (उत) अपि च (अभीवर्गात्) अभि+वृजी वर्जने-घञ्। उपसर्गस्य घव्यमनुष्ये बहुलम्। पा० ६।३।१२२। इति दीर्घः। अभितो वृज्यते गृहादिभिः परिच्छिद्यते यः। अवकाशात् (दिवः) आकाशस्य (परि) (अन्तरिक्षाय) अन्तरिक्षं ज्ञातुम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥
