ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।
Word-Meaning: - (शिखण्डिन्) हे परम उद्योगी ! [रुद्र परमेश्वर] (हरितम्) शत्रुनाशक, (हिरण्यम्) बलयुक्त, (सहस्रघ्नि) सहस्रों [शत्रुओं] के मारनेवाले, (शतवधम्) सैकड़ों हथियारोंवाले, (धनुः) धनुष को तू (बिभर्षि) धारण करता है। (रुद्रस्य) रुद्र [दुःखनाशक परमेश्वर] का (इषुः) बाण (देवहेतिः) दिव्य [अद्भुत] वज्र (चरति) चलता रहता है, (तस्यै) उस [बाण] के रोकने के लिये (इतः) यहाँ से (यतमस्याम् दिशि) चाहे जौन-सी दिशा हो, उसमें (नमः) नमस्कार है ॥१२॥
Connotation: - जैसे शूर पुरुष अनेक प्रकार के सहस्रघ्नि, शतघ्नी, शतवध आदि अस्त्र-शस्त्र बना के शत्रुओं को मारता है, वैसे ही सर्वशक्तिमान् परमात्मा अपने अनन्त सामर्थ्य से पापियों का नाश कर देता है। इससे हम लोग उसकी आज्ञा का उल्लङ्घन न करके उसकी शरण में रहें ॥१२॥