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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
Word-Meaning: - (जातवेदः) हे उत्तम ज्ञानवाले ! (आदित्य) हे आदित्य ! [अखण्ड ब्रह्मचारी] (बहु) बहुत (कुणपम्) लोथों को (अन्तः) [रणक्षेत्र के] बीच में (धेहि) रख। (मेरी) (इयम्) यह (सुहिता) अच्छे ढङ्ग से स्थापित (सेना) सेना (त्रिषन्धेः) त्रिसन्धि [म० २। विद्वान् सेनापति] के (वशे) वश में (अस्तु) होवे ॥४॥
Connotation: - जिस समय प्रधान सेनापति रणभूमि में शत्रुदलन करे, अन्य वीर सैन्य पुरुष अपनी सुव्यूढ सेना से उसका सहाय करें ॥४॥
Footnote: ४−(अन्तर्) रणक्षेत्रमध्ये (धेहि) धर (जातवेदः) जातानि प्रशस्तानि वेदांसि ज्ञानानि यस्य तत्संबुद्धौ (आदित्य) अ० ११।९।२५। अखण्डब्रह्मचारिन् (कुणपम्) अ० ११।९।१०। शवशरीरजातम् (बहु) बहुलम् (त्रिषन्धेः) म० २। सेनापतेः (इयम्) दृश्यमाना (सेना) (सुहिता) सुष्ठु धृता। सुव्यूढा (अस्तु) (मे) मम (वशे) प्रभुत्वे ॥
