ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।
Word-Meaning: - (अग्ने) हे विद्वान् पुरुष ! (देवयानान्) देवताओं [विजय चाहनेवालों] के चलने योग्य (पथः) मार्गों को (समाचिनुष्व) चौरस करके ठीक-ठीक सुधार, [उन पर] (अनु संप्रयाहि) निरन्तर यथाविधि आगे बढ़, [और उन्हें दूसरों के लिये] (कल्पय) बना। (एतैः) इन (सुकृतैः) सुन्दर [विचार से] बनाये हुए [मार्गों] द्वारा (सप्तरश्मौ) सात किरणोंवाले (नाके) [लोकों वा प्रकाश आदि के चलानेवाले] सूर्य पर (अधि) राजा होकर (तिष्ठन्तम्) ठहरे हुए (यज्ञम्) पूजनीय [परमात्मा] को (अनु) निरन्तर (गच्छेम) पावें ॥३६॥
Connotation: - मनुष्यों को योग्य है कि वे वेदद्वारा विचारपूर्वक अपना आचरण ऐसा धार्मिक बनावें, जिसके अनुकरण से सब मनुष्य सूर्य आदि के प्रकाशक परमात्मा को प्राप्त होकर शुभ गुणों से प्रकाशमान होवें। सूर्य की किरणों में शुल्क, नील, पीत, रक्त, हरित, कपिश और चित्र, ये सात वर्ण हैं ॥३६॥