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ब॒भ्रेर॑ध्वर्यो॒ मुख॑मे॒तद्वि मृ॒ड्ढ्याज्या॑य लो॒कं कृ॑णुहि प्रवि॒द्वान्। घृ॒तेन॒ गात्रानु॒ सर्वा॒ वि मृ॑ड्ढि कृ॒ण्वे पन्थां॑ पि॒तृषु॒ यः स्व॒र्गः ॥

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Pad Path

बभ्रे: । अध्वर्यो इति । मुखम् । एतत् । वि । मृड्ढि ।आज्याय । लोकम् । कृणुहि । प्रऽविद्वान् । घृतेन । गात्रा । अनु । सर्वा । वि । मृड्ढि । कृण्वे । पन्थाम् । पितृषु । य: । स्व:ऽग: ॥१.३१॥

Atharvaveda » Kand:11» Sukta:1» Paryayah:0» Mantra:31


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।

Word-Meaning: - (अध्वर्यो) हे हिंसा के न करनेवाले पुरुष ! (बभ्रेः) पोषण करनेवाले [अन्नरूप परमेश्वर] के (एतत्) इस (मुखम्) मुख [भोजन के ऊपरी भाग] को (वि मृड्ढि) संवार ले, (प्रविद्वान्) बड़ा ज्ञानवान् तू (आज्याय) घी के लिये (लोकम्) स्थान (कृणुहि) बना। (घृतेन) घी से (सर्वा) सब (गात्रा) अङ्गों को (अनु) निरन्तर [देख-भाल कर के] (वि मृड्ढि) शोध ले, (पन्थाम्) मार्ग (कृण्वे) मैं बनाता हूँ (यः) जो [मार्ग] (पितृषु) पालन करनेवाले [विज्ञानियों] के बीच (स्वर्गः) सुख पहुँचानेवाला है ॥३१॥
Connotation: - जैसे थाली में चावल आदि भोजन परोसकर और संवार कर ऊपर घृत आदि छोड़कर स्वादिष्ठ बनाते हैं, वैसे ही योगी भोजनरूप परमात्मा को [थालीरूप] हृदय में धारण करके [घृतरूप] ज्ञान से विचारता हुआ विज्ञानियों में आनन्द पावे ॥३१॥
Footnote: ३१−(बभ्रेः) आदृगमहनजनः किकिनौ लिट् च। पा० ३।२।१७१। डुभृञ् धारणपोषणयोः-कि प्रत्ययः। पोषकस्य। अन्नरूपस्य परमेश्वरस्य (अध्वर्यो) अ० ७।७३।५। न ध्वरति न हिनस्तीति अध्वरः। ध्वृ कौटिल्ये हिंसायां च-अच्। ध्वरतिर्वधकर्मा-निघ० २।१९। अध्वर+या प्रापणे-कु। हे अहिंसाप्रापक (मुखम्) उपरिदेशम् (एतत्) (विमृड्ढि) म० २९। विशेषेण शोधय भूषय (आज्याय) घृतमिश्रणाय (लोकम्) स्थानम् (कृणुहि) कुरु (प्रविद्वान्) प्रकर्षेण जानन् (घृतेन) सर्पिषा (गात्रा) अङ्गानि (अनु) अनुक्रमेण (सर्वा) सर्वाणि (विमृड्ढि) (कृण्वे) करोमि (पन्थाम्) पन्थानम् (पितृषु) पालकेषु। विज्ञानिषु (यः) (पन्थाः) (स्वर्गः) सुखस्य गमयिता ॥