ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।
Word-Meaning: - [हे ईश्वर !] (श्राम्यतः) श्रमी [ब्रह्मचारी आदि तपस्वी] का, (पचतः) पक्का करनेवाले [दृढ़ निश्चय करनेवाले], (सुन्वतः) तत्त्व निचोड़नेवाले [विज्ञानी पुरुष] का (विद्धि) तू ज्ञान कर और (स्वर्गम्) सुख पहुँचानेवाले (पन्थाम्) मार्ग में (एनम्) इस [जीव] को (अधि) ऊपर (रोहय) चढ़ा, (येन) जिस [मार्ग] से वह [जीव] (यत्) जो (परम्) बड़ा उच्च (वयः) जीवन है, [उसको] (आपद्य) पाकर (उत्तमम्) उत्तम (नाकम्) सुखस्वरूप (परमम्) सर्वोत्कृष्ट (व्योम) विविध रक्षक [परब्रह्म ओ३म्] को (रोहात्) ऊँचा होकर पावे ॥३०॥
Connotation: - जो मनुष्य तपस्वी, दृढ़विश्वासी और विवेकी होकर अपना जीवन सुधारते हैं, वे ही सर्वरक्षक, [ओ३म्] परमात्मा को पाते अर्थात् उसकी आज्ञा पालकर संसार का सुधार करते हैं ॥३०॥