ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।
Word-Meaning: - [हे परमात्मन् !] (महता) बड़ी (महिम्ना) महिमा से (उरुः) विस्तृत और (सहस्रपृष्ठः) सहस्रों स्तोत्रवाला तू (सुकृतस्य) सुकर्म के (लोके) समाज में (प्रथस्व) प्रसिद्ध हो। (पितामहाः) पितामह [पिता के पिता] आदि, (पितरः) पिता आदि [सब गुरुजन], (प्रजा) सन्तान, और (उपजा) सन्तान के सन्तान [ये हैं] (पञ्चदशः) [पाँच प्राण, अर्थात् प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान+पाँच इन्द्रिय अर्थात् श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण+पाँच भूत अर्थात् भूमि, जल, अग्नि, वायु, और आकाश इन] पन्द्रह पदार्थवाला जीवात्मा (अहम्) मैं (ते) तेरा (पक्ता) पक्का [अपने हृदय में दृढ़] करनेवाला (अस्मि) हूँ ॥१९॥
Connotation: - मनुष्य को योग्य है कि परमेश्वर की आज्ञा पालन करके संसार में अपने बड़ों और छोटों के साथ सुकर्मी होकर आनन्द भोगें ॥१९॥