परमात्मा और जीवात्मा के स्वरूप का उपदेश।
Word-Meaning: - (पञ्चवाही) पाँच [पृथिवी आदि तत्त्व] को ले चलनेवाला [परमेश्वर] (एषाम्) इन [सब लोकों] के (अग्रम्) आगे-आगे (वहति) चलता है, (प्रष्टयः) प्रश्न करने योग्य पदार्थ (युक्ताः) संयुक्त होकर (अनुसंवहन्ति) [उसके] पीछे चले चलते हैं। (अस्य) इस [परमेश्वर] का (अयातम्) न जाना [निकट रहना, विद्वानों करके] (ददृशे) देखा गया है और (यातम्) जाना [निकट रहना, विद्वानों करके] (ददृशे) देखा गया है और (यातम्) जाना [दूर होना] (न) नहीं, (अवरम्) सर्वोत्तम (परम्) परब्रह्म [विद्वानों से] (नेदीयः) अधिक निकट और [अविद्वानों से] (दवीयः) अधिक दूर है ॥८॥
Connotation: - परमात्मा पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश पाँच तत्त्वों को रचकर नियम में चलाता है। विद्वान् लोग उसको अपने भीतर जानकर प्रबल, और मूर्ख उसे दूर समझकर निर्बल रहते हैं ॥८॥