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यमब॑ध्ना॒द्बृह॒स्पति॑र्म॒णिं फालं॑ घृत॒श्चुत॑मु॒ग्रं ख॑दि॒रमोज॑से। तमिन्द्रः॒ प्रत्य॑मुञ्च॒तौज॑से वी॒र्याय॒ कम्। सो अ॑स्मै॒ बल॒मिद्दु॑हे॒ भूयो॑भूयः॒ श्वःश्व॒स्तेन॒ त्वं द्वि॑ष॒तो ज॑हि ॥

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Pad Path

यम् । अबध्नात् । बृहस्पति: । मणिम् । फालम् । घृतऽश्चुतम् । उग्रम् । खदिरम् । ओजसे । तम् । इन्द्र: । प्रति । अमुञ्चत । ओजसे । वीर्याय । कम् । स: । अस्मै । बलम् । इत् । दुहे । भूय:ऽभूय:। श्व:ऽश्व: । तेन । त्वम् । द्विषत: । जहि ॥६.७॥

Atharvaveda » Kand:10» Sukta:6» Paryayah:0» Mantra:7


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

सब कामनाओं की सिद्धि का उपदेश।

Word-Meaning: - (बृहस्पतिः) बृहस्पति [बड़े ब्रह्माण्डों के स्वामी परमेश्वर] ने (यम्) जिस... म० ६। (तम्) उस [वैदिक नियम] को (इन्द्रः) इन्द्र [मेघसमान उपकारी पुरुष] ने (ओजसे) बल के लिये और (वीर्याय) पराक्रम के लिये (कम्) सुख से (प्रति अमुञ्चत) स्वीकार किया है। (सः) वह [वैदिक नियम] (अस्मै) इस [उपकारी] के लिये (इत्) ही (बलम्) बल को (भूयोभूयः) बहुत-बहुत..... म० ६ ॥७॥
Connotation: - जिस परमेश्वर की आज्ञा से मेघ वृष्टि द्वारा अन्न आदि उत्पन्न करके संसार में पुष्टि करता है, उसी परमात्मा की उपासना से बल प्राप्त करके विद्वान् लोग सदा उपकार करते रहे हैं और करते रहें ॥७॥
Footnote: ७−(इन्द्रः) मेघ इवोपकारी पुरुषः (ओजसे) बलाय (वीर्याय) वीरकर्मणे। पराक्रमाय (कम्) सुखेन (बलम्) सामर्थ्यम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥