Go To Mantra

यथा॒ वाते॑न॒ प्रक्षी॑णा वृ॒क्षाः शेरे॒ न्यर्पिताः। ए॒वा स॒पत्नां॒स्त्वं मम॒ प्र क्षि॑णीहि॒ न्यर्पय। पूर्वा॑ञ्जा॒ताँ उ॒ताप॑रान्वर॒णस्त्वा॒भि र॑क्षतु ॥

Mantra Audio
Pad Path

यथा । वातेन । प्रऽक्षीणा: । वृक्षा: । शेरे । निऽअर्पिता: । एव । सऽपत्नान् । त्वम् । मम । प्र । क्षिणीहि । नि । अर्पय । पूर्वान् । जातान् । उत । अपरान् । वरण: । त्वा । अभि । रक्षतु ॥३.१५॥

Atharvaveda » Kand:10» Sukta:3» Paryayah:0» Mantra:15


Reads 62 times

PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

Word-Meaning: - (यथा) जैसे (वातेन) वायु से (प्रक्षीणाः) नष्ट कर दिये गये और (न्यर्पिताः) झुकाये हुए (वृक्षाः) वृक्ष (शेरे=शेरते) सो जाते हैं, (एव) वैसे ही (मम) मेरे (सपत्नान्) वैरियों को (त्वम्) तू (प्र क्षिणीहि) नाश कर दे और (नि अर्पय) झुका दे, (पूर्वान्) पहिले (जातान्) उत्पन्नों (उत) और (अपरान्) पिछलों को। (वरणः) वरण [स्वीकार करने योग्य वैदिक बोध वा वरना औषध] (त्वा) तेरी (अभि) सब ओर से (रक्षतु) रक्षा करे ॥१५॥
Connotation: - मनुष्यों को शत्रुओं के नाश करने में सदा उद्योग करना चाहिये ॥१५॥
Footnote: १५−(यथा) (वातेन) वायुना (प्रक्षीणाः) विनाशिताः (वृक्षाः) (शेरे) छान्दसं रूपम्। शेरते। वर्तन्ते (न्यर्पिताः) नीचीकृताः (प्र क्षिणीहि) विनाशय (न्यर्पय) नीचय। अन्यत् पूर्ववत् ॥