Go To Mantra

प्र॒भ्राज॑मानां॒ हरि॑णीं॒ यश॑सा सं॒परी॑वृताम्। पुरं॑ हिर॒ण्ययीं॒ ब्रह्मा वि॑वे॒शाप॑राजिताम् ॥

Mantra Audio
Pad Path

प्रऽभ्राजमानाम् । हरिणीम् । यशसा । सम्ऽपरिवृताम् । पुरम् । ह‍िरण्ययीम् । ब्रह्म । आ । विवेश । अपराऽजिताम् ॥२.३३॥

Atharvaveda » Kand:10» Sukta:2» Paryayah:0» Mantra:33


Reads 70 times

PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

मनुष्यशरीर की महिमा का उपदेश।

Word-Meaning: - (ब्रह्म) ब्रह्म [परमात्मा] ने (भ्राजमानाम्) बड़ी प्रकाशमान (हरिणीम्) दुःख हरनेवाली (यशसा) यश से (संपरीवृताम्) सर्वथा छायी हुई, (हिरण्ययीम्) अनेक बलोंवाली, (अपराजिताम्) कभी न जीती गई (पुरम्) पूर्ति में (आ) सब ओर से (विवेश) प्रवेश किया है ॥३३॥
Connotation: - विज्ञानी पुरुष सर्वथा अक्षय परिपूर्ण परमात्मा की उपासना से सदा आनन्द में मग्न रहते हैं ॥३३॥ इति प्रथमोऽनुवाकः ॥
Footnote: ३३−(प्रभ्राजमानाम्) प्रदीप्यमानाम् (हरिणीम्) हृञ्-इनन्, ङीप्। दुःखहरणशीलाम् (यशसा) कीर्त्या (संपरीवृताम्) समन्तादाच्छादिताम् (पुरम्) म० २८। पूर्तिम् (हिरण्ययीम्) म० ३१। हिरण्यय-ङीप्। बलैर्युक्ताम् (ब्रह्म) परमेश्वरः (आ) समन्तात् (विवेश) प्रविष्टवान् (अपराजिताम्) अपराभूताम् ॥